हर वो लम्हा, जो संजो कर रखा है…
छूना है आसमान
१० फरवरी, जयपुर…. भोपाल जाने के पहले से ही खड़े होने की कोशिश शुरू कर दी थी मैंने और इस कोशिश में एक बार चोट भी लगा चुकी हूँ. वो तो मम्मी ने संभाल लिया था. पर मैं भी हार मानने वालों में से नही हूँ. कोशिश नही करुँगी तो सीखूंगी कैसे ?
दिन भर तो नानी को परेशान करती ही हूँ. पर कल पापा घर पर थे तो सोचा उनसे ही सीखती हूँ. कभी उनके कपडों को पकड़ कर खड़े होने की कोशिश की कभी अपने आप ही.
पापा ने बेड के पास बैठा दिया तो बेड पकड़ कर भी कोशिश की. एक दो बार गिर भी पड़ी पर मैंने कोशिश नही छोड़ी और देखिये मेरी कोशिश कामयाब भी हुई.
आजकल दिन भर मेरी धमा चौकडी तो चलती ही रहती है. और सब से ज्यादा मस्ती मुझे तब सूझती है जब सब एक साथ खाना खाने बैठते है. तब मैं कमरे में भागना शुरू करती हूँ और फिर किसी को उठना ही पड़ता है मुझे सँभालने.
मुझसे दोस्ती करोगे ?