रंग बिरंगे गुब्बारे…
आज तो हम प्रदर्शनी में गए थे | इतनी भीड़… उफ़ इतने लोग एक साथ मैंने पहली बार देखा | पर वहां घूमने में तो बड़ा मज़ा आया | कितने सारे लोग……… कोई गुब्बारे खरीद रहा था कोई खाने के स्टाल पर टूट पड़ रहा था | हमने भी खाने के स्टाल से खाने पीने की चीजे ली पर मम्मी ने मुझे कुछ खिलाया नही | कहने लगी ये तुम्हारे लिए नही है | चलो कोई बात नही…… जब बड़ी हो जाउंगी तो सारी कसर निकल लूंगी | पापा ने मेरे लिए गुब्बारे लिए…. रंग बिरंगे गुब्बारे….कोई लाल कोई पीला कोई हरा…. पर घर आते आते गुब्बारे तो फूट भी गए | पापा ने कहा वो फिर ला देंगे | आज कल ठण्ड थोडी कम हो रही है | लगता है ठण्ड ने बबलू अंकल की कविता पढ़ ली होगी | आपने पढ़ी ??? नही……….. कोई बात नही मैं यहाँ पर लिख रही हूँ | ये मेरी फेवरिट कविता है | क्यूंकि ठण्ड मुझे भी पसंद नही | मुझे भी ये स्वेटर और मोजे-टोपी पहनना बिल्कुल पसंद नही है | पर क्या करें ठण्ड में तो पहननी पड़ती है ना | मुझे तो ऐसे वाले कपड़े पसंद है | अच्छा अब आप ये कविता पढिये मैं डिनर करने जा रही हूँ | जाओ जाओ सर्दी जी
गर्मी जी को आने दो
स्वेटर और रजाई को
बक्से में पहुंचाने दो
कोहरे की चादर को ओढे
ऊंघते रहते सूरज दादा
सर्दी हवा लगती है जैसे
टीचर ने मारा हो तमाचा
झपकी जैसे छोटे दिन हैं
रातें कोई लंबी सडक
जान पे मेरी बन आई है
पर क्या है तुमहें कोई फरक
भूल चुके हैं खेलकूद सब
घर में दुबके रहते हम
कांप रहे हैं थरथर थरथर
अब तो ले लेने दो दम


