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कल जब पापा घर आये, मैं सो रही थी. मैंने नींदों में ही उनको देखो और उनको एक स्माईल दी और वापस सो गयी. तभी मुझे अचानक याद आया की मुझे तो पापा को कुछ बताना है. वो ये की मेरे हाथ और पैरों में कुछ मच्छरों ने काट लिया था और उसे शायद मैंने नाख़ून से खुरच दिया होगा तो एक मेरे हाथ में और एक पैर में छोटे छोटे दो जख्म बन गए हैं. और यही बताने के लिए तो मैं नींद से उठ गयी. मैंने स्वेटर का आस्तीन ऊपर किया और पापा को जख्म दिखाया. फिर पापा ने जख्म पर थोडा सा क्रीम लगाया और फिर मैं सो गयी. |
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एक जख्म पैर पर भी था, मुझे हर एक दो घंटे में जब भी जख्म की याद आती मैं पहुँच जाती पापा के पास ‘पापा…. तत्त्ता…. तत्त्ता… ‘ कहते कहते… |
| ….और उनको जख्म दिखा देती और पापा हर बार क्रीम लगा देते और मैं फिर खेल में बिजी हो जाती. |
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पापा…., तत्त्ता…. तत्त्ता…
4
Jan
Monday, 2010 | posted by: लविज़ा | Laviza
Filed under: Activities












बहुत खुशनसीब बेटी है। बहुत बढ़िया है उसके मन की व्यथा को। जब वो बड़ी हो गई तो देखेगी कि कितने साल पहले उसने ब्लॉगिंग शुरू कर दी।
जाले से बच के लहना, बहुत थन्दी है आजकल।
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विश्व का सबसे शक्तिशली सुपर कम्प्यूटर।
2009 के ब्लागर्स सम्मान हेतु ऑनलाइन नामांकन चालू है।
पापा के पास हर मर्ज की दावा होती है.. हमारे पापा के पास भी थी.. आज भी है..
पापा के पास हर मर्ज की दवा होती है.. हमारे पापा के पास भी थी.. आज भी है..
अले पापा इतपे दवा लदाओ न!
अरे लवि बेटा को मच्छल काट लहे हैं? पापा को बोलो उनका इलाज करें.
रामराम.
ये तो बहुत बुरा हुआ की मच्छरों ने काटा लवी को!
आगे से मच्छरों से बच कर रहना ..
नव वर्ष की शुभकामनायें भी सब को !ओके?बाय
मच्छर बचना बहुत जरूरी है!
जल्दी ही तुमको मच्छर पर एक कविता पढ़वाऊँगा!
इस महत्त्वपूर्ण जानकारी को
चर्चा-मंच के माध्यम से
प्रचारित करने हेतु आभार –
“शुद्ध संयुक्ताक्षर “शृ” का प्रयोग करना चाहिए!”
ओंठों पर मधु-मुस्कान खिलाती शुभकामनाएँ!
नए वर्ष की नई सुबह में, महके हृदय तुम्हारा!
संयुक्ताक्षर “श्रृ” सही है या “शृ”, FONT लिखने के 24 ढंग!
संपादक : “सरस पायस”
थैंक यू अंकल
हिंदी चिट्ठों की चर्चा में लविज़ा का जिक्र हुआ है!
चर्चा-मंच पर भी हिंदी चिट्ठों की चर्चा की जाती है!
लवी बेटा हम इतने बड़े हो गए घोडा क्या गधे पर भी नहीं सवारी की ….इस बार मुझे भी ले चलना